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Premikaa/प्रेमिका/ नवनाथ महादेव वरपे/मराठी कविता/ - नवनाथ महादेव वरपे Lyrics Singer नवनाथ महादेव वरपे प्रेमिका हा सुंदर...

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Premikaa/प्रेमिका/ नवनाथ महादेव वरपे/मराठी कविता/ - नवनाथ महादेव वरपे Lyrics

Singer नवनाथ महादेव वरपे

प्रेमिका

हा सुंदर प्रांजळ चेहरा
करितो मजला सदा बावरा
कसे रूप तुझे फुलले
तुझ्यातच मन माझे दंगून गेले

ही शुभ्र तुझी काया
जशी सूर्याची कोमल छाया
या सुंदर तुझ्या चेहऱ्यावरती
जीव किती बावरती

तुझे काळे नितळ मोकळे केस
जीव करिती सदैव कासावीस
हा रंगच तुझा निराळा असा
करी जीवाला माझ्या वेडापिसा

या धुंद धुंद समयी
प्रीतीची लाट पसरली
तू फक्त नजर फिरवती
काळीज होई खालीवरती

तूझे हसणे असे मधाळ
जीव होई ग सखे घायाळ
हे स्वच्छंदी पाहून नखरे तुझे
मन गंधाळून फुलते सजनी माझे

तुझी एक करारी नजर
जीव घाबरून जाई चूर
तू एकदाच जेंव्हा हसते
तेंव्हा मन माझे फुलते

- नवनाथ महादेव वरपे
कार्ला,उस्मानाबाद
२७/४/२०२०



माझ्या मराठीची गोडी कविता - वि. म. कुलकर्णी

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माझ्या मराठीची गोडी कविता - वि. म. कुलकर्णी 

माझ्या मराठीची गोडी कविता - वि. म. कुलकर्णी


Writer- वि. म. कुलकर्णी

माझ्या मराठीची गोडी

माझ्या मराठीची गोडी 

मला वाटते अवीट माझ्या

मराठीचा मंद माना

नित्य मोहावित ज्ञानोबांची

तुकयाची मुक्केशाची जनार्डची

माइया मराठीची गोश रामदास

शिवाजीची 'या रे.या रे अवघे जण,

हाक मायमराठीची बंद्यखळाळा राज्यले
 
साक्ष भीमेच्या पाण्याची उकतणतणे घेऊन

उभी शाहीर मंडळी मुजरयाची

मानकरी वीराचीही मायबोली

नागराधा चाले फाळ 

अभंगाध्या ताल्पवर सेवजीक

विसावली पहाटेच्या जात्यावर

हिये स्वरूप देखणे हिची

चालतरफेची हिच्या नेत्री

प्रभा दाटे सात्विकाची,

अचनाची कुणा गोदा

सिंधुजन हिची वाढवती करती

आचार्याचे आशिर्वाद हिल्या

मुसी वेद होती माझ्या

मराठीची चोरी नित्य नवे

रुप दावी अवनत होई माया

मुखी उमटते ओवी

-वि. म. कुलकर्णी



Bhagat singh/शहीद भगत सिंह की देशभक्ति कविता और नारे

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Bhagat singh/शहीद भगत सिंह की देशभक्ति कविता और नारे 

Bhagat singh/शहीद भगत सिंह की देशभक्ति कविता और नारे

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शहीद भगत सिंह की देशभक्ति कविता और नारे

शहीद भगत सिंह पर कविता हिंदी में


शीर्षक: शहीद भगत सिंह पर कविता
जय हिन्द देशभक्तों, आज हम आपके लिए शहीद भगत सिंह पर लिखी कविताएं का संग्रह लेकर आए है। भगत सिंह जी की कविता जो मन और दिल को उत्साह पूर्ण भर देती है और दिलों में देश के प्रति देश भक्ति जगा देती है।

शहीद भगत सिंह पर कविता हिंदी में

शहीद भगत सिंह के लिए कविता


“इतिहास में गूंजता एक नाम है भगत सिंह
शेर की दहाड़ सा जोश था जिसमे वे थे भगत सिंह
छोटी सी उम्र में देश के लिए शहीद हुए जवान थे भगत सिंह
आज भी जो रोंगटे खड़े करदे ऐसे विचारों के धनि थे भगत सिंह....”

Shahid Bhagat Singh Poem in Hindi

डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम।
गिरा के भागे न बम भी असेंबली से हम।

उड़ाए फिरता था हमको खयाले-मुस्तकबिल,
कि बैठ सकते न थे दिल की बेकली से हम।

हम इंकलाब की कुरबानगह पे चढ़ते हैं,
कि प्यार करते हैं ऐसे महाबली से हम।

जो जी में आए तेरे, शौक से सुनाए जा,
कि तैश खाते नहीं हैं कटी-जली से हम।

न हो तू चीं-ब-जबीं, तिवरियों पे डाल न बल,
चले-चले ओ सितमगर, तेरी गली से हम।

Poem on Veer Bhagat Singh in Hindi
भारत के लिये तू हुआ बलिदान भगत सिंह ।
था तुझको मुल्को-कौम का अभिमान भगत सिंह ।।

वह दर्द तेरे दिल में वतन का समा गया ।
जिसके लिये तू हो गया कुर्बान भगत सिंह ।।

वह कौल तेरा और दिली आरजू तेरी ।
है हिन्द के हर कूचे में एलान भगत सिंह ।|

फांसी पै चढ़के तूने जहां को दिखा दिया ।
हम क्यों न बने तेरे कदरदान भगत सिंह ।।

प्यारा न हो क्यों मादरे-भारत के दुलारे ।
था जानो-जिगर और मेरी शान भगत सिंह ।।

हरएक ने देखा तुझे हैरत की नजर से ।
हर दिल में तेरा हो गया स्थान भगत सिंह ।।

भूलेगा कयामत में भी हरगिज न ए 'किशोर' ।
माता को दिया सौंप दिलोजान भगत सिंह ।।
[ ब्रिटिश राज के प्रतिबंधित साहित्य से ]
शहीद भगत सिंह से संबंधित कविताएं

Famous Hindi Poem For Bhagat Singh
मेरा मुल्क मेरा देश मेरा ये वतन
शांति का उन्नति का प्यार का चमन
इसके वास्ते सब निछावर है…..
मेरा तन… मेरा मन……

ऐ वतन, ऐ वतन, ऐ वतन
जाने मन जाने मन जाने मन...

Heart Touching Poem For Bhagat Singh in Hindi
बात सुनो भाई भगत सिंह
गुंडे चोर इंडिया के…
बात सुनो भाई भगत सिंह
गुंडे चोर इंडिया के…

भारत माँ को लुटते है जनता के सपने टूटते हैं,
गरीब भूके मरते है अमीरों के घर भरते है….
लड़किया सड़े तेजाब मै
जवानी रुले शराब में…
आज देश आजाद है आज देश आजाद है
आपकी क़ुरबानी पर नाज है.
पर क्या करे ऐसी आजादी का
हर दिन दिखती बर्बादी का….
यह हे हाल देश का
सफ़ेद कपड़ो में गुंडों के भेस का.
किसी को कोई टेंशन नही बूढों को मिलती पेंशन नही..

गाय का खाते चारा यह,
हमारा देश है महान का लगाते नारा यह…
किस चीज का इनको नाज है,
किस चीज का हमे नाज है…
ऐसा क्या है जो हमारे देश में महान हैं,
ऐसा क्या है जो हमारे देश में महान हैं……



शहीद भगत सिंह के लिए कविता हिंदी में

तेईस मार्च को
मर्द-ए-मैदां चल दिया सरदार, तेईस मार्च को ।
मान कर फ़ांसी गले का हार, तेईस मार्च को।
आसमां ने एक तूफ़ान वरपा कर दिया,
जेल की बनी ख़ूनी दीवार, तेईस मार्च को।
शाम का था वक्त कातिल ने चराग़ गुल कर दिया,
उफ़ ! सितम, अफ़सोस, हा ! दीदार, तेईस मार्च को।
तालिब-ए-दीदार आए आख़री दीदार को,
हो सकी राज़ी न पर सरकार, तेईस मार्च को।
बस, ज़बां ख़ामोश, इरादा कहने का कुछ भी न कर,
ले हाथ में कातिल खड़ा तलवार, तेईस मार्च को।
ऐ कलम ! तू कुछ भी न लिख सर से कलम हो जाएगी,
गर शहीदों का लिखा इज़हार, तेईस मार्च को।
जब ख़ुदा पूछेगा फिर जल्लाद क्या देगा जवाब,
क्या ग़ज़ब किया है तूने सरकार, तेईस मार्च को।
कीनवर कातिल ने हाय ! अपने दिल को कर ली थी,
ख़ून से तो रंग ही ली तलवार, तेईस मार्च को।
हंसते हंसते जान देते देख कर 'कुन्दन' इनहें,
पस्त हिम्मत हो गई सरकार, तेईस मार्च को।

-कुन्दन
(मार्च (आखिरी हफ़्ता) १९३१)
एक वो जमाना था जब लोग साथ चला करते थे, मरने मिटने कि बातें किया करते थे और एक समय है लोग खिड़की से झाँक कर देखते है कि हो क्या रहा है।

Famous Hindi Poem For Bhagat Singh
अगर भगत सिंह और दत्त मर गए

सख़तियों से बाज़ आ ओ आकिमे बेदादगर,
दर्दे-दिल इस तरह दर्दे-ला-दवा हो जाएगा ।

बाएसे-नाज़े-वतन हैं दत्त, भगत सिंह और दास,
इनके दम से नखले-आज़ादी हरा हो जाएगा ।

तू नहीं सुनता अगर फर्याद मज़लूमा, न सुन,
मत समझ ये भी बहरा ख़ुदा हो जाएगा ।

जोम है कि तेरा कुछ नहीं सकते बिगाड़,
जेल में गर मर भी गए तो क्या हो जाएगा ।

याद रख महंगी पड़ेगी इनकी कुर्बानी तुझे,
सर ज़मीने-हिन्द में महशर बपा हो जाएगा ।

जां-ब-हक हो जाएंगे शिद्दत से भूख-ओ-प्यास की,
ओ सितमगर जेलख़ाना कर्बला हो जाएगा ।

ख़ाक में मिल जाएगा इस बात से तेरा वकार,
और सर अकवा में नीचा तेरा हो जाएगा।

-अज्ञात
१८ अगस्त १९२९, बन्दे मात्रिम (उर्दू पत्र)-लाहौर
ख्वाहिशों कि चाह में लोग अपनों को भुलाएं बैठे है वो दौर कुछ और था जब लोग एक दूसरे के लिए मरा करते थे।

Poem on Bhagat Singh in Hindi

बम चख़ है अपनी शाहे रईअत पनाह से
बम चख़ है अपनी शाहे रईयत पनाह से
इतनी सी बात पर कि 'उधर कल इधर है आज' ।
उनकी तरफ़ से दार-ओ-रसन, है इधर से बम
भारत में यह कशाकशे बाहम दिगर है आज ।
इस मुल्क में नहीं कोई रहरौ मगर हर एक
रहज़न बशाने राहबरी राहबर है आज ।
उनकी उधर ज़बींने-हकूमत पे है शिकन
अंजाम से निडर जिसे देखो इधर है आज ।

-अल्लामा 'ताजवर' नजीबाबादी
२ मार्च १९३०-वीर भारत
(लाहौर से छपने वाला रोज़ाना अखबार)

(रईयत पनाह=जनता को शरण देने वाला,
दार-ओ-रसन=फांसी का फंदा, कशाकशे-
बाहम दिगर=आपसी खींचतान, रहरौ=रास्ते
का साथी, रहज़न=लुटेरा, ज़बींने=माथा, शिकन=बल)
जिंदगी के चाह में दूनिया खड़ी है, वो कौन थे फिर जो दुनिया के लिए मर मिटे।

Shaheed Bhagat Singh Poetry in Hindi

ज़िंदा-बाश ऐ इंक़लाब ऐ शोला-ए-फ़ानूस-ए-हिन्द

ज़िंदा-बाश ऐ इंक़लाब ऐ शोला-ए-फ़ानूस-ए-हिन्द
गर्मियाँ जिस की फ़रोग़-ए-मंक़ल-ए-जाँ हो गईं

बस्तियों पर छा रही थीं मौत की ख़ामोशियाँ
तू ने सूर अपना जो फूँका महशरिस्ताँ हो गईं

जितनी बूँदें थीं शहीदान-ए-वतन के ख़ून की
क़स्र-आज़ादी की आराइश का सामाँ हो गईं

मर्हबा ऐ नौ-गिरफ़्तारान-ए-बेदाद-ए-फ़रंग
जिन की ज़ंजीरें ख़रोश-अफ़ज़ा-ए-ज़िंदाँ हो गईं

ज़िंदगी उन की है दीन उन का है दुनिया उन की है
जिन की जानें क़ौम की इज़्ज़त पे क़ुर्बां हो गईं

-ज़फ़र अली ख़ाँ-लाहौर
२ मार्च १९३०-वीर भारत
(लाहौर से छपने वाला रोज़ाना अखबार)
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सब के सब है भाई भाई…

Hindi Poem on Bhagat Singh For Kids

मरते मरते


दाग़ दुश्मन का किला जाएँगे, मरते मरते ।
ज़िन्दा दिल सब को बना जाएंगे, मरते मरते ।
हम मरेंगे भी तो दुनिया में ज़िन्दगी के लिये,
सब को मर मिटना सिखा जाएंगे, मरते मरते ।
सर भगत सिंह का जुदा हो गया तो क्या हुया,
कौम के दिल को मिला जाएंगे, मरते मरते ।
खंजर -ए -ज़ुल्म गला काट दे परवाह नहीं,
दुक्ख ग़ैरों का मिटा जाएंगे, मरते मरते ।
क्या जलाएगा तू कमज़ोर जलाने वाले,
आह से तुझको जला जाएंगे, मरते मरते ।
ये न समझो कि भगत फ़ांसी पे लटकाया गया,
सैंकड़ों भगत बना जाएंगे, मरते मरते ।
-अज्ञात
(मार्च (आखिरी हफ़्ता) १९३१)

Hindi Poems on Bhagat Singh

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान
आज लग रहा कैसा जी को कैसी आज घुटन है
दिल बैठा सा जाता है, हर साँस आज उन्मन है
बुझे बुझे मन पर ये कैसी बोझिलता भारी है
क्या वीरों की आज कूच करने की तैयारी है?

हाँ सचमुच ही तैयारी यह, आज कूच की बेला
माँ के तीन लाल जाएँगे, भगत न एक अकेला
मातृभूमि पर अर्पित होंगे, तीन फूल ये पावन,
यह उनका त्योहार सुहावन, यह दिन उन्हें सुहावन।

फाँसी की कोठरी बनी अब इन्हें रंगशाला है
झूम झूम सहगान हो रहा, मन क्या मतवाला है।
भगत गा रहा आज चले हम पहन वसंती चोला
जिसे पहन कर वीर शिवा ने माँ का बंधन खोला।

झन झन झन बज रहीं बेड़ियाँ, ताल दे रहीं स्वर में
झूम रहे सुखदेव राजगुरु भी हैं आज लहर में।
नाच नाच उठते ऊपर दोनों हाथ उठाकर,
स्वर में ताल मिलाते, पैरों की बेड़ी खनकाकर।

पुनः वही आलाप, रंगें हम आज वसंती चोला
जिसे पहन राणा प्रताप वीरों की वाणी बोला।
वही वसंती चोला हम भी आज खुशी से पहने,
लपटें बन जातीं जिसके हित भारत की माँ बहनें।

उसी रंग में अपने मन को रँग रँग कर हम झूमें,
हम परवाने बलिदानों की अमर शिखाएँ चूमें।
हमें वसंती चोला माँ तू स्वयं आज पहना दे,
तू अपने हाथों से हमको रण के लिए सजा दे।

सचमुच ही आ गया निमंत्रण लो इनको यह रण का,
बलिदानों का पुण्य पर्व यह बन त्योहार मरण का।
जल के तीन पात्र सम्मुख रख, यम का प्रतिनिधि बोला,
स्नान करो, पावन कर लो तुम तीनो अपना चोला।

झूम उठे यह सुनकर तीनो ही अल्हण मर्दाने,
लगे गूँजने और तौव्र हो, उनके मस्त तराने।
लगी लहरने कारागृह में इंक्लाव की धारा,
जिसने भी स्वर सुना वही प्रतिउत्तर में हुंकारा।

खूब उछाला एक दूसरे पर तीनों ने पानी,
होली का हुड़दंग बन गई उनकी मस्त जवानी।
गले लगाया एक दूसरे को बाँहों में कस कर,
भावों के सब बाँढ़ तोड़ कर भेंटे वीर परस्पर।

मृत्यु मंच की ओर बढ़ चले अब तीनो अलबेले,
प्रश्न जटिल था कौन मृत्यु से सबसे पहले खेले।
बोल उठे सुखदेव, शहादत पहले मेरा हक है,
वय में मैं ही बड़ा सभी से, नहीं तनिक भी शक है।

तर्क राजगुरु का था, सबसे छोटा हूँ मैं भाई,
छोटों की अभिलषा पहले पूरी होती आई।
एक और भी कारण, यदि पहले फाँसी पाऊँगा,
बिना बिलम्ब किए मैं सीधा स्वर्ग धाम जाऊँगा।

बढ़िया फ्लैट वहाँ आरक्षित कर तैयार मिलूँगा,
आप लोग जब पहुँचेंगे, सैल्यूट वहाँ मारूँगा।
पहले ही मैं ख्याति आप लोगों की फैलाऊँगा,
स्वर्गवासियों से परिचय मैं बढ, चढ़ करवाऊँगा।

तर्क बहुत बढ़िया था उसका, बढ़िया उसकी मस्ती,
अधिकारी थे चकित देख कर बलिदानी की हस्ती।
भगत सिंह के नौकर का था अभिनय खूब निभाया,
स्वर्ग पहुँच कर उसी काम को उसका मन ललचाया।

भगत सिंह ने समझाया यह न्याय नीति कहती है,
जब दो झगड़ें, बात तीसरे की तब बन रहती है।
जो मध्यस्त, बात उसकी ही दोनों पक्ष निभाते,
इसीलिए पहले मैं झूलूं, न्याय नीति के नाते।

यह घोटाला देख चकित थे, न्याय नीति अधिकारी,
होड़ा होड़ी और मौत की, ये कैसे अवतारी।
मौत सिद्ध बन गई, झगड़ते हैं ये जिसको पाने,
कहीं किसी ने देखे हैं क्या इन जैसे दीवाने?

मौत, नाम सुनते ही जिसका, लोग काँप जाते हैं,
उसको पाने झगड़ रहे ये, कैसे मदमाते हें।
भय इनसे भयभीत, अरे यह कैसी अल्हण मस्ती,
वन्दनीय है सचमुच ही इन दीवानो की हस्ती।

मिला शासनादेश, बताओ अन्तिम अभिलाषाएँ,
उत्तर मिला, मुक्ति कुछ क्षण को हम बंधन से पाएँ।
मुक्ति मिली हथकड़ियों से अब प्रलय वीर हुंकारे,
फूट पड़े उनके कंठों से इन्क्लाब के नारे ।

इन्क्लाब हो अमर हमारा, इन्क्लाब की जय हो,
इस साम्राज्यवाद का भारत की धरती से क्षय हो।
हँसती गाती आजादी का नया सवेरा आए,
विजय केतु अपनी धरती पर अपना ही लहराए।

और इस तरह नारों के स्वर में वे तीनों डूबे,
बने प्रेरणा जग को, उनके बलिदानी मंसूबे।
भारत माँ के तीन सुकोमल फूल हुए न्योछावर,
हँसते हँसते झूल गए थे फाँसी के फंदों पर।

हुए मातृवेदी पर अर्पित तीन सूरमा हँस कर,
विदा हो गए तीन वीर, दे यश की अमर धरोहर।
अमर धरोहर यह, हम अपने प्राणों से दुलराएँ,
सिंच रक्त से हम आजादी का उपवन महकाएँ।

जलती रहे सभी के उर में यह बलिदान कहानी,
तेज धार पर रहे सदा अपने पौरुष का पानी।
जिस धरती बेटे हम, सब काम उसी के आएँ,
जीवन देकर हम धरती पर, जन मंगल बरसाएँ।

(क्रान्ति गंगा-श्रीकृष्ण सरल)


Short Poem on Bhagat Singh in Hindi

मिटने वालों की वफा का यह सबक याद रहे
मिटने वालों की वफा का यह सबक याद रहे,
बेड़ियां पांवों में हों और दिल आजाद रहे।

एक साइर भी इनाइत न हो आजाद रहे,
साकिया, जाते हैं महफ़िल तेरी आबाद रहे।

आप का हम से हुया था कभी समाने वफ़ा,
जालम मगर वो हुया था भी घड़ी याद रहे।

बाग में ले के जनम हम ने असीरी झेली,
हम से अच्छे रहे जंगल में जो आजाद रहे।

मुझ को मिल जाए रुकने के लिए साख मेरी,
कौन कहता है कि गुलशन में न सय्याद रहे।

हुकम माली का है यह फूल न खिलने पाएं,
चुप रहे बाग में कोयल अगर आजाद रहे।

बागवान दिल से वतन को यह दुआ देता है,
मैं रहूं या ना रहूं यह चमन आबाद रहे।

(बृज नारायण चकबस्त)

शहीद भगत सिंह पर कविता कोश

मोख तेईस मार्च थी था इकतीस का साल,
मिले इन्हें फांसी सुजन किया गया बदहाल।

था ठीक शाम का सात बजा, फन्दा था भगत सिंह के डाला,
और झूला फांसी का झूला, सरदार भगत सिंह मतवाला।

मरने से पहले विदा ली, हमदम, हमराहों से उसने,
"डाऊन डाऊन विद यूनियन जैक" की सदा लगाई उसने।

बदले में सब कैदियों ने, "भगत सिंह जिन्दाबाद" कहा,
भारत माता का जयघोष किया, 'इन्कलाब जिन्दाबाद' कहा।

मोख तेईस मार्च थी था इकतीस का साल,
मिले इन्हें फांसी सुजन किया गया बदहाल।

(मोख=तारीख़)
(पंडित हर्ष दत्त पांडे)

Poem on Shaheed Bhagat Singh in Hindi

भगत सिंह की याद


करुणामय मां की छाती पर किया बंधु को आह हलाल,
बधिक खड़ा है देखा कैसा रंगे हुए दोनों कर लाल।

मां रोती है, मैं रोता हूं, जगती का रोता हर रोम,
खिल खिल हंसता क्रूर कसाई, प्रतिध्वनित होता है व्योम।

मुंह आंखों से फिरता लहू, और धधकती, छब की आंच,
रस्सी, तखता, गड़ा घिरनी, सभी रहे आंखों में नाच।

कौन ? कहां वे गए ? इसे अब कोई बताता है,
नहीं भूलता हाय ! हाय रे ! भगत सिंह याद आता है।
(-अज्ञात)

Bhagat Singh Par Kavita in Hindi

खून का आंसू


सुखदेव, भगत सिंह, राजगुरु, आजादी के दीवाने थे,
हंस-हंस के झूले फांसी पर भारत मां के मस्ताने थे ।

वह मेरे नहीं हैं जिन्दा हैं, वह अमर शहीद कहाएंगे,
वह प्यारे वतन पै निसार हुए, वह वीरों में मरदाने थे ।

यह मरजी उस मालिक की थी, सब उसने खेल दिखाए हैं,
था लिखा उन्हें कुर्बान होना, फांसी के मुफ्त बहाने थे ।

ब्रिटिश ने कहा माफी मांगो, शायद जिंदगानी हो जाए,
हंस हंस के सब ने जवाब दिया, नहीं हशर में दाग लगाने थे।

दुख दर्द से तूने पाला था, कुछ काम ना हम आए तेरे,
आजाद ना मां कर तुम को चले, मालिक के यई मनमाने थे।

सुखदेव, भगत सिंह, राजगुरु, आजादी के दीवाने थे
हंस-हंस के झूले फांसी पर भारत मां के मस्ताने थे ।

-(कमल)

देश भक्ति कविता भगत सिंह

मर्दाना भगत सिंह


सरताज नौजवानों का मर्दाना भगत सिंह,
आजादी का दीवाना था मर्दाना भगत सिंह ।

होती भी मीटिंग असेंबली में जिस दम फेंका बम,
बम केस में पकड़ा गया मस्ताना भगत सिंह ।

राजगुरु सुखदेव दोनों मित्रों को लेकर साथ,
फांसी चढ़ स्वर्ग सिधारा मस्ताना भगत सिंह ।

(श्रीयुत प्रताप सव्तंतर)

भगत सिंह मस्ताना था कविता

भारत माता का सपूत आजादी का दीवाना था हंस कर झूल गया फांसी पर भगत सिंह मस्ताना था।

भारत माता का सपूत आजादी का दीवाना था-
हंस कर झूल गया फांसी पर भगतसिंह मस्ताना था-
नौ जवान वह पंजाबी गजब शेर का दिल वाला था-
देश, प्रेम का रस पीकर वह बना हुआ था मतवाला-
दिन में चैन, रात में नींद कभी उसे नही आती थी...

ग्राम-छुलकारी, पोस्ट-पसला, जिला-अनूपपुर (मध्यप्रदेश)
-तरंग, कविता, भागवती केवट
शहीद भगत सिंह हिन्दी कविता
प्यारा भगत सिंह

हुआ देश का तू दुलारा, भगत सिंह ।
झुके सर तेरे आगे हमारा, भगत सिंह ।

नौजवानों के हेतु हुए आप गांधी,
रहे राष्ट्र के एक गुवारा, भगत सिंह ।

किया काम बेशक है हिंसा का तुम ने,
यही दोष है इक तुम्हारा, भगत सिंह ।

मगर देश हित के लिए जान दे दी,
बढ़ा शान तेरा हमारा, भगत सिंह ।

तेरी देशभक्ति पे सब हैं निछावर,
"अभय" तेरा साहस है न्यारा, भगत सिंह ।

हुआ देश का तू दुलारा, भगत सिंह
झुके सर तेरे आगे हमारा, भगत सिंह ।

-(अभय)

Shahid Bhagat Singh Speech in Hindi

जल्लाद से

लगा कर फांसी ही क्या मान होगा,
रहे याद, तू भी सदा परेशान होगा ।

अगर जान मांगी तो क्या तुमने मांगा,
मेरी जान से तुझ को नुकसान होगा ।

लगा ले तू फांसी करो शाद दिल निज,
यह तेरे ही रोने का सामान होगा ।

नहीं होगा इस से अमन तू याद रखना,
तेरा तंग हर दम यहां औसान होगा ।

हम आते हैं लेकर जन्म फिर दुबारा,
वही संग में बम का सब सामान होगा ।

दलेंगे हम छाती पै फिर मूंग तेरी,
उसी बम का हर जगह पे व्याख्यान होगा ।

हमें आशा पूरी नजर आ रही है,
कि कुछ दिन का तू और महमान होगा ।

चढ़ा दे तू फांसी समझ हम को कांटा,
स्वर्ग का हमें यह तो ब्यान होगा ।

सफल हुआ उसका जन्म लेना जहाँ में,
जो अपने वतन पे यूं कुर्बान होगा ।

अमर यहाँ पे कब तक तुम रहोगे,
आखिर तो प्राणों का अवसान होगा ।

सुनो आज भारत के तुम नौजवानो,
मेरे बाद तुम्हारा भी इम्तिहान होगा ।

यह व्यर्य नहीं जाएगा खून हमारा,
'सव्तंतर' इसी विधि से हिन्दुस्तान होगा ।
(श्रीयुत प्रताप सव्तंतर)

भगत सिंह पर भाषण

तीन शहीद


सुखदेव, भगत सिंह, राजगुरु, ये तीनों देश दुलारे हैं,
फांसी पै लटक कर जान जो दी, जी-जान से हम को प्यारे हैं।

यह मौत नहीं, यह जीवन है, यह मरना नहीं, यह जीना है,
नामूसे-वतन पे शहीद हुए, नामूसे-वतन को प्यारे हैं ।

वह अपनी जान पै खेले हैं, बेलाग है उनकी कुर्बानी,
ईसार के चर्खे-बाला पर, रोशन ये चमकते तारे हैं ।

गांधी ने सुनी जिस वक्त खबर, अफसोस किया औ फरमाया,
'मेरी तहरीक के हक में उनके खून के कतरे शरारे हैं'।

जब उनकी जवानी का नक्शा, आंखों के आगे आता है,
मगमूम हमातन रंजोगम से हो जाते हम सारे हैं ।

हम अपने शहीदों की, क्यों याद दिलों से दूर करें,
क्या और किसी ने भुलाए हैं, क्या और किसी ने बिसारे हैं?

सुखदेव, भगत सिंह, राजगुरु, ये तीनों देश दुलारे हैं,
फांसी पै लटक कर जान जो दी, जी-जान से हम को प्यारे हैं।
भगत सिंह पर छोटा सा निबंध
खून के छींटे

ये छींटे खून की उस दामन-ए-कातिल कहानी है,
शहीदान-ए-वतन की कुछ निशानी देखते जाओ ।

अभी लाखों ही बैठे बुझाने प्यास अपनी,
खत्म हो जाएगा खंजर का पानी, देखते जाओ ।

अरे साहब जिवह करने से क्यों मुंह फेर लेते हो,
मेरी गर्दन पे खंजर की रवानी, देखते जाओ ।

करेगा खून-ए-नाहक कब तलक मजलूम का जालिम,
रहेगी कब तलक ये हुकुमरानी, देखते जाओ ।

हमारी आह से आतिश झटक उठेगी दुनिया में,
अजब गर्दश है रंगत आसमानी, देखते जाओ ।

ये छींटे खून की उस दामन-ए-कातिल कहानी है,
शहीदान-ए-वतन की कुछ निशानी देखते जाओ ।
भगत सिंह पर निबंध
फांसी के शहीद

ये आह भगत सिंह की खाली ना जाएगी,
फांसी है शेरे-नर की कुछ रंग लाएगी ।

शिकवा नहीं है गवर्नमेंट से, तकदीर हमारी,
देखेंगे किस्मत कब तक यह पलटा ना खाएगी ।

भाई बहन को उसने दिलासा दिया था खूब,
हम आजादी पर मिटते हैं रूह फिर लौट आएगी ।

भाई हमारे मरने का मातम ना करना,
कहानी मेरी भारत में कुछ कर दिखाएगी ।
शहीद भगत सिंह पर शायरी
ऐलान

फांसी पे वीरों का चढ़ना, कुछ और ही रंग लाएगा ।
इस तरह मरने से हिन्द पे गम का बादल छाएगा ।

हकूमते बरतानिया ! अब जुल्म की हद हो चुकी,
ऐलां ! तेरा जुल्म अब हम से सहा नहीं जाएगा ।

प्यारे भगत सिंह वीर को हम से जुदा जो है किया,
इसका अब अंजाम तू थोड़े दिनों में पाएगा ।

ए नौजवानो ! तैयार हो जायो मरने के लिए,
देश की वेदी पर अब से सर चढ़ाया जाएगा ।

(इस रचना पर काम जारी है)

Bhagat Singh Shayari in Hindi

डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम

डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम,
गिरा के भागे न बम भी असेंबली से हम।

उड़ाए फिरता था हमको खयाले-मुस्तकबिल,
कि बैठ सकते न थे दिल की बेकली से हम।

हम इंकलाब की कुरबानगह पे चढ़ते हैं,
कि प्यार करते हैं ऐसे महाबली से हम।

जो जी में आए तेरे, शौक से सुनाए जा,
कि तैश खाते नहीं हैं कटी-जली से हम।

न हो तू चीं-ब-जबीं, तिवरियों पे डाल न बल,
चले-चले ओ सितमगर, तेरी गली से हम।

-अज्ञात
१५ जून १९२९, बन्दे मात्रिम (उर्दू पत्र)-लाहौर
(खयाले-मुस्तकबिल=भविष्य का विचार,
कुरबानगह=बलीवेदी, चीं-ब-जबीं=क्रुद्ध)

Bhagat Singh Quotes in Hindi

हिन्दोसतान

आज़ाद होगा अब तो हिन्दोसतां हमारा,
बेदार हो रहा है हर नौजवां हमारा।

आज़ाद होगा होगा अब तो हिन्दोसतां हमारा,
है ख़ैरख़वाहे-भारत खुरदो-कलां हमारा।

वे सख़तियां कफस की, बे आबो-दाना मरना,
कैदी का फिर भी कहना, हिन्दोसतां हमारा।

इक कतले-सांडरस पर, इतनी सज़ाएं उनको,
रोता है लाजपत को, हिन्दोसतां हमारा।

बीड़ा उठा लिया है, आज़ादियों का हमने,
जन्नत निशां बनेगा हिन्दोसतां हमारा।

सोज़े-सुख़न से अपने, मजनूं हमें बना दे,
बच्चों की हो ज़बां पर, हिन्दोसतां हमारा।

इक बार फिर से नग़मा 'अनवर' हमें सुना दे,
"हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोसतां हमारा।"
-अनवर
७ मार्च १९३०-थड़थल
(लाहौर से प्रकाशित तीन रोज़ा पत्र)


शहीद भगत सिंह पर कविता

*हंसते हंसते फांसी को गले लगाया*
मोमबत्तियां बुझ गयी
चिराग तले अँधेरा छाया था
फांसी के फंदे पर जब
तीनों वीरों को झुलाया था
सुखदेव,भगत सिंह,राजगुरु के
मन को कुछ और न भाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

तीनों के साथ आज
एक बड़ा सा काफिला था
भारतवर्ष में लगा जैसे
मेला कोई रंगीला था
लेकर जन्म इस पावन धरा पर
उन्होंने अपना फर्ज निभाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

मौत का उनको डर न था
सीने में जोश जोशीला था
परवाह नहीं थी अपने प्राण की
बसंती रंग का पहना चोला था,
छोड़ मोह माया इस जग की
अपनों को भी भुलाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

इंकलाब का नारा लिए
विदा लेने की ठानी थी
लटक गए फांसी पर किन्तु
मुख से उफ्फ तक न निकाली थी,
देश भक्ति को देख तुम्हारी
सबने अश्रुधार बहाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

तुम छोड़ गए इस दुनिया को
दिखाकर आजादी का सपना
सपना हुआ था सच लेकिन
हमने खो दिया बहुत कुछ अपना,
गोरों ने अपनी संस्कृति को
हमारे सभ्याचार में बसाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

टुकड़े टुकड़े कर गोरों ने
भारत माँ का सीना चीरा था
एकसूत्र करने का हम पर
बहुत ही बड़ा बीड़ा था,
हिन्दू मुस्लिम के झगड़ों ने
इंसानियत के रिश्ते को भरमाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

आज़ादी के बाद तो देखो
कैसे यह लगी बीमारी थी
हिन्दू मुस्लिम के चक्कर में
लड़ना सबकी लाचारी थी,
कुछ को हिंदुस्तान मिला
तो कुछ ने पाकिस्तान बनाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

जातिवाद का खेल में
बंट गया समाज भी अपना
ये तो वो न था
जो देखा था तुमने सपना,
सत्ता का खेल निराला आया
परिवार वाद भी उसमे गहरा छाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

गाँधी नेहरू और जिन्ना ने फिर
राजनितिक माहौल बनाया था
देश की सत्ता की खातिर
अखंडता को दांव पर लगाया था,
बस अपनी बात मनवाने को
देश को टुकड़ों में बंटवाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

सरहद के उस बंटवारे का
आज तलक असर दिखता है
भारत पाक की सीमाओं पर
सिपाही मौत से लड़ता है,
तुमने जो सोचा था वैसा
कोई ये देश बना न पाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

इक वक़्त के खाने के लिए
कोई गरीब दिन-रात तरसता है
कुछ ने रेशम की पोशाक वालों का
गुस्सा मजलूमों पर बरसता है,
कहीं जात-पात का शोर
तो कहीं आरक्षण ने सबको लड़ाया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

जैसा न तुमने सोचा था
वैसी है अपनी आज़ादी
देश के लोग ही कर रहे हैं
आज इस देश की बर्बादी,
जब-जब सोचा तुम्हारे बारे में
मुझको तो रोना आया था
हँसते हँसते देश की खातिर
फांसी को गले लगाया था।

स्वरचित
हरीश चमोली
टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड)



भगत सिंह के 7 शेर, इन्हें सुनकर कोई भी वतन पर मर मिटे...
सीनें में जुनूं, आंखों में देशभक्ति की चमक रखता हूं
दुश्मन की सांसें थम जाए, आवाज में वो धमक रखता हूं


लिख रहा हूं मैं अंजाम, जिसका कल आगाज आएगा
मेरे लहू का हर एक कतरा, इंकलाब लाएगा
मैं रहूं या न रहूं पर, ये वादा है मेरा तुझसे
मेरे बाद वतन पर मरने वालों का सैलाब आएगा

मुझे तन चाहिए, ना धन चाहिए
बस अमन से भरा यह वतन चाहिए
जब तक जिंदा रहूं, इस मातृ-भूमि के लिए
और जब मरूं तो तिरंगा ही कफन चाहिए


कभी वतन के लिए सोच के देख लेना,
कभी मां के चरण चूम के देख लेना,
कितना मजा आता है मरने में यारों,
कभी मुल्क के लिए मर के देख लेना,


हम अपने खून से लिक्खें कहानी ऐ वतन मेरे
करें कुर्बान हंस कर ये जवानी ऐ वतन मेरे

मैं भारतवर्ष का हरदम अमिट सम्मान करता हूं
यहां की चांदनी, मिट्टी का ही गुणगान करता हूं
मुझे चिंता नहीं है स्वर्ग जाकर मोक्ष पाने की
तिरंगा हो कफन मेरा, बस यही अरमान रखता हूं


जमाने भर में मिलते हैं आशिक कई,
मगर वतन से खूबसूरत कोई सनम नहीं होता,
नोटों में भी लिपट कर,
सोने में सिमटकर मरे हैं शासक कई,
मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफन नहीं होता




Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi/अटल बिहारी वाजपेयी की 34 कविता हिंदी में - Atal Bihari Vajpayee

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Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi/अटल बिहारी वाजपेयी की 34 कविता हिंदी में - Atal Bihari Vajpayee 

Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi/अटल बिहारी वाजपेयी की 34 कविता हिंदी में - Atal Bihari Vajpayee

Writer: Atal Bihari Vajpayee

अटल बिहारी वाजपेयी की कविता हिंदी में

1. हरी हरी दूब पर

हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बुँदों को ढूंढूँ?


सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|

Poems of Atal Bihari Vajpayee in Hindi

2. खून क्यों सफेद हो गया?


खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया.
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.
खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाएं, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.

Atal Bihari Vajpayee Poetry in Hindi

3. क्षमा करो बापू ! तुम हमको, वचन भंग के हम

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।
जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

Best Poetry of Atal Bihari Vajpayee in Hindi

4. कौरव कौन, कौन पांडव
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

Atal Bihari Vajpayee Famous Poetry in Hindi

5. मौत से ठन गई

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।


मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।


आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

Poem of Atal Bihari Vajpayee in Hindi Haar Nahi Manunga
6.गीत नहीं गाता हूं..

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं..

लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
गीत नहीं गाता हूं…

पीठ मे छुरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

गीत नया गाता हूं…

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूं
गीत नया गाता हूं…

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं…

Atal Ji Ki Kavita in Hindi

7. खून क्यों सफेद हो गया?

खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया.

बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई.

दूध में दरार पड़ गई.
खेतों में बारूदी गंध,

टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी,
व्यथित सी बितस्ता है.

वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता,
तुम्हें वतन का वास्ता.


बात बनाएं, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.

अटल जी की कविता इन हिंदी

8. कदम मिलाकर चलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा


बाधाएं आती हैं आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पांवों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,

निज हाथों से हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रुदन में, तूफानों में,
अमर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा!

कदम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कछार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को दलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अमर ध्‍येय पथ,
प्रगति चिरन्तन कैसा इति अथ,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

कुश कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वञ्चित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुवन,
पर-ह‍ति अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

Tribute To Shri Atal Bihari Vajpayee in Hindi

9. मनाली मत जइयो

मनाली मत जइयो, गोरी
राजा के राज में।

जइयो तो जइयो,
उड़िके मत जइयो,
अधर में लटकीहौ,
वायुदूत के जहाज़ में।

जइयो तो जइयो,
सन्देसा न पइयो,
टेलिफोन बिगड़े हैं,
मिर्धा महाराज में।

जइयो तो जइयो,
मशाल ले के जइयो,
बिजुरी भइ बैरिन
अंधेरिया रात में।

जइयो तो जइयो,
त्रिशूल बांध जइयो,
मिलेंगे ख़ालिस्तानी,
राजीव के राज में।

मनाली तो जइहो।
सुरग सुख पइहों।
दुख नीको लागे, मोहे
राजा के राज में।

Shri Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

10. एक बरस बीत गया

एक बरस बीत गया

झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया

सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया

पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया..

Best Poems by Atal Bihari Vajpayee in Hindi

11. पंद्रह अगस्त की पुकार/ अटल बिहारी बाजपेयी
पंद्रह अगस्त का दिन कहता —
आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी है,
रावी की शपथ न पूरी है।।

जिनकी लाशों पर पग धर कर
आज़ादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश
ग़म की काली बदली छाई।।

कलकत्ते के फुटपाथों पर
जो आँधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के
बारे में क्या कहते हैं।।

हिंदू के नाते उनका दु:ख
सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो
सभ्यता जहाँ कुचली जाती।।

इंसान जहाँ बेचा जाता,
ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,
डालर मन में मुस्काता है।।

भूखों को गोली नंगों को
हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कंठों से जेहादी
नारे लगवाए जाते हैं।।

लाहौर, कराची, ढाका पर
मातम की है काली छाया।
पख्तूनों पर, गिलगित पर है
ग़मगीन गुलामी का साया।।

बस इसीलिए तो कहता हूँ
आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?
थोड़े दिन की मजबूरी है।।

दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक
आज़ादी पर्व मनाएँगे।।

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से
कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ,
जो खोया उसका ध्यान करें।।

– अटल बिहारी वाजपेयी

All Poems of Atal Bihari Vajpayee in Hindi 

12. कदम मिला कर चलना होगा

बाधाएँ आती है आएँ,
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों से हँसते–हँसते,
आग लगा कर जलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

हास्य–रूदन में, तूफानों में,
अमर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना हागा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

उजीयारे में, अंधकार में
कल कछार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत–शत आकर्षक,
अरमानों को दलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अमर ध्येय पथ,
प्रगति चिरन्तन कैसा इति अथ,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न माँगते,
पावस बनकर ढलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

कुश काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुवन,
पर–हित अर्पित अपना तन–मन,
जीवन को शत–शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

~ अटल बिहारी वाजपेयी

Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi Hindu Tan Man

13. हरी हरी दूब पर

हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|

अटल जी की कविता – अटल जी की कविताएं

14. कौरव कौन, कौन पांडव

कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

Atal Bihari Vajpayee Ki Kavita Hindi Mein

15. दूध में दरार पड़ गई

दूध में दरार पड गई
ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

अटल बिहारी वाजपेयी की कविता – Atal Bihari Vajpayee Poem in Hindi

16. क्षमा याचना

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।

चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

Atal Bihari Vajpayee Poetry in Hindi – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

17. मनाली मत जइयो

मनाली मत जइयो, गोरी
राजा के राज में।

जइयो तो जइयो,
उड़िके मत जइयो,
अधर में लटकीहौ,
वायुदूत के जहाज़ में।

जइयो तो जइयो,
सन्देसा न पइयो,
टेलिफोन बिगड़े हैं,
मिर्धा महाराज में।

जइयो तो जइयो,
मशाल ले के जइयो,
बिजुरी भइ बैरिन
अंधेरिया रात में।

जइयो तो जइयो,
त्रिशूल बांध जइयो,
मिलेंगे ख़ालिस्तानी,
राजीव के राज में।

मनाली तो जइहो।
सुरग सुख पइहों।
दुख नीको लागे, मोहे
राजा के राज में।

Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi – Speech on Atal Bihari Vajpayee in Hindi
18.आज़ादी का दिन मना,

आज़ादी का दिन मना,
नई ग़ुलामी बीच;
सूखी धरती, सूना अंबर,
मन-आंगन में कीच;
मन-आंगम में कीच,
कमल सारे मुरझाए;
एक-एक कर बुझे दीप,
अंधियारे छाए;
कह क़ैदी कबिराय
न अपना छोटा जी कर;
चीर निशा का वक्ष
पुनः चमकेगा दिनकर।

19. अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएं

अंतरद्वंद्व
क्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर?
शव का अर्चन,
शिव का वर्जन,
कहूँ विसंगति या रूपांतर?
वैभव दूना,
अंतर सूना,
कहूँ प्रगति या प्रस्थलांतर?


20. जीवन की ढलने लगी सांझ

जीवन की ढलने लगी सांझ
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ।

बदले हैं अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

सपनों में मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।

21. अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएं

ठन गई
मौत से ठन गई.
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई

मौत से ठन गई

22. अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएं
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पाँव
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूं
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सदर साँसों ने
चिनारों को झुलस डाला,
मगर हिमपात को देती
चुनौती एक दुर्ममाला,

बिखरे नीड़,
विहँसे चीड़,
आँसू हैं न मुस्कानें,
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूँ।
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ..


23. एक बरस बीत गया

एक बरस बीत गया

झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया

सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया

पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया

24. आओ फिर से दिया जलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्त्तमान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ..!

25. अटल जी की कविता इन हिंदी
क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

26. अटल जी की कविता इन हिंदी
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है

दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज

किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार

दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते..

27. Poem of Atal Bihari Vajpayee in Hindi

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफन की तरह सफेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिल-खिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनन्दन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छांव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफि नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बंटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

जरूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूंट सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई कांटा न चुभे,
कोई कलि न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
– अटल बिहारी वाजपेयी-

28. Poem of Atal Bihari Vajpayee in Hindi

किसी रात को
मेरी नींद चानक उचट जाती है
आँख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूँ कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही
ये अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ!

यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ़ नहीं करेगा!

29. राह कौन सी जाऊँ मैं ?

चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

सपना जन्मा और मर गया
मधु ऋतु में ही बाग झर गया
तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

दो दिन मिले उधार में
घाटों के व्यापार में
क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं ?

30. जो बरसों तक सड़े जेल में

जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें।
जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें।
याद करें काला पानी को,
अंग्रेजों की मनमानी को,
कोल्हू में जुट तेल पेरते,
सावरकर से बलिदानी को।
याद करें बहरे शासन को,
बम से थर्राते आसन को,
भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू
के आत्मोत्सर्ग पावन को।
अन्यायी से लड़े,
दया की मत फरियाद करें।
उनकी याद करें।
बलिदानों की बेला आई,
लोकतंत्र दे रहा दुहाई,
स्वाभिमान से वही जियेगा
जिससे कीमत गई चुकाई
मुक्ति माँगती शक्ति संगठित,
युक्ति सुसंगत, भक्ति अकम्पित,
कृति तेजस्वी, घृति हिमगिरि-सी
मुक्ति माँगती गति अप्रतिहत।
अंतिम विजय सुनिश्चित, पथ में
क्यों अवसाद करें?
उनकी याद करें।

31. मैं अखिल विश्व का गुरु महान

मैं अखिल विश्व का गुरू महान,
देता विद्या का अमर दान,
मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग
मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर,
मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार
क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरा स्वर नभ में घहर-घहर,
सागर के जल में छहर-छहर
इस कोने से उस कोने तक
कर सकता जगती सौरभ भय।

32. दुनिया का इतिहास पूछता

दुनिया का इतिहास पूछता,
रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता।
वह उन्नत ईरान कहाँ है?
दीप बुझे पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा,
किन्तु चीर कर तम की छाती,
चमका हिन्दुस्तान हमारा।
शत-शत आघातों को सहकर,
जीवित हिन्दुस्तान हमारा।
जग के मस्तक पर रोली सा,
शोभित हिन्दुस्तान हमारा।

33. भारत जमीन का टुकड़ा नहीं

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

34. Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता,
अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता,
दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
चिनगारी का खेल बुरा होता है ।
औरों के घर आग लगाने का जो सपना,
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो,
अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ।
ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो,
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है?
तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं,
माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई?

अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से
तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से
भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध,
काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा ।



Kadam Milakar Chalna Hoga/कदम मिलाकर चलना होगा Poem of Atal Bihari Vajpayee in Hindi - Atal Bihari Vajpayee

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Kadam Milakar Chalna Hoga/कदम मिलाकर चलना होगा Poem of Atal Bihari Vajpayee in Hindi - Atal Bihari Vajpayee 

Kadam Milakar Chalna Hoga/कदम मिलाकर चलना होगा Poem of Atal Bihari Vajpayee in Hindi - Atal Bihari Vajpayee

Writer: Atal Bihari Vajpayee


Kadam Milakar Chalna Hoga Poem of Atal Bihari Vajpayee in Hindi

बाधाएं आती हैं आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।


कदम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।


कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।



Atal Bihari Vajpayee poems/भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं से विशेष 5 कविताएं - Atal Bihari Vajpayee

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Atal Bihari Vajpayee poems/भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं से विशेष 5 कविताएं - Atal Bihari Vajpayee 

Atal Bihari Vajpayee poems/भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं से विशेष 5 कविताएं - Atal Bihari Vajpayee

 Writer: Atal Bihari Vajpayee


आओ फिर से दिया जलाएँ



आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें
बुझी हुई बाती सुलगाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्त्तमान के मोहजाल में
आने वाला कल न भुलाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने
नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ


गीत नया गाता हूँ



गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात


प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ


गीत नहीं गाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

पीठ मे छुरी सा चांद
राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

जीवन बीत चला

जीवन बीत चला
कल कल करते आज
हाथ से निकले सारे
भूत भविष्यत की चिंता में
वर्तमान की बाजी हारे

पहरा कोई काम न आया

रसघट रीत चला
जीवन बीत चला।

हानि लाभ के पलड़ों में
तुलता जीवन व्यापार हो गया
मोल लगा बिकने वाले का
बिना बिका बेकार हो गया

मुझे हाट में छोड़ अकेला
एक एक कर मीत चला
जीवन बीत चला।


मौत से ठन गई
ठन गई
मौत से ठन गई

जूझने का मेरा इरादा न था
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा



प्रवासातील भेट/ विशु ईश्वर/कविता चारोळी - विशु ईश्व सोलापुर

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प्रवासातील भेट/ विशु ईश्वर/कविता चारोळी - विशु ईश्व सोलापुर 


Poem विशु ईश्व सोलापुर
 Writer विशु ईश्व सोलापुर.
ll प्रवासातील भेट ll

तु आणि मी
रेल्वेच्या एका डब्यात,
अवचितपणे ,अचानक.
तु विचारलीस ,एक प्रश्न.बरा आहेस का ?

मी फक्त हसलो. आयुष्य तुला कळले नाही कि मला.
आपण फक्त चालत आहोत.
सारं काही मागे मागे जात आहे.
खिडकीतल्या दृष्या सारखे.
असे अचानक का भेटतो आपण?
कशासाठी भेटतो?काहीच कळत नाही.
आता रेल्वे प्लॅटफॉर्मवर थांबेल.

तु ही उत्तरशील. निघून जाशील.
पुन्हा कधी भेटशील माहीत नाही.
जे मिळेल ते मिळवुन
आयुष्य जगुन आलो
तर पुन्हा आपण येथेच भेटूया.

त्यावेळी तु विचारू नकोस प्रश्न.
बरा आहेस का म्हणून.

काव्य लेखन: विशु ईश्वर. सोलापुर.



कोण खुणवतो एकांती/कविता चारोळी - उदय कुलकर्णी

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कोण खुणवतो एकांती/कविता चारोळी - उदय कुलकर्णी 


Poem Write उदय कुलकर्णी

कोण खुणवतो एकांती या
जरी अविरत मी निश्चल
न सोडणे व्रत हे हाथी
गाठू उत्तुंग हिमाचल

सगे सोयरे बंधू आपण
सज्ज राहू या समरी
एकीने अन साथीने
नष्ट करू विपत्ती भूवरी


हीच आपली कुंभिनि
होईन जगन्माता
देश आपला बनेल
अखंड विश्वाचा दाता

विश्वातील याअखंड सिंधु
तयांना पदकमले दावू
अचंबित तो श्वापद होईल
मजबूत करू बाहू


अल्प हे नसे नसे तोकडे
फक्त काही क्षण सोसू
एक क्षण येईल असा
आपण परमवैभवा असू...

-उदय कुलकर्णी, लातूर



मी आहे अगम्य/अक्षय शिंदे. ( विजयसुत )/मराठी कविता /Marathi Kavitaa

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मी आहे अगम्य..



मी आहे अगम्य/अक्षय शिंदे. ( विजयसुत )/मराठी कविता /Marathi Kavitaa




मी आहे अगम्य..
आहे मी कधीही न संपणारा
त्या विधात्याचाच अंश..
माझ्याच हातांच्या मुठीमध्ये
सामावलं आहे सारं ब्रह्मांड..
मी पुरुष - मी स्त्री.,यापलीकडे जाऊन
आहे मी ते नवचैतन्य
या संपूर्ण विश्वाला उजळून टाकणारं..
आहे मी सेवक.,
या भारत भूमिचा..
या समाजाचा..
अनाथांचा.. दीनदुबळ्यांचा..
मीच आहे तो कर्णपिता.,
मीच आहे तो चंद्र.,
मीच आहे त्या तारकांचा
लख्ख प्रकाश.,
मीच आहे अक्षय...
अक्षय आहे माझं अस्तित्व...


:copyright: अक्षय शिंदे. ( विजयसुत )